Monday, 20 July 2015

बासनी बेलिमा

♤ बासनी ♤

इस मुस्लिम बहुल्य गांव से समझे पानी की एक-एक बूंद की कीमत
इस मुस्लिम बहुल्य गांव से समझे पानी की एक-एक बूंद की कीमत
गर्मी का मौसम अब नागौर के बासनी गांव के लोगों को कतई परेशान नहीं करता. वहां के लोग तो बल्कि दावा करते हैं कि उनके गांव में पीने के पानी की समस्या पैदा हो ही नहीं सकती

असल में बासनी के परंपरागत पेयजल स्रोत गोरधन तालाब में इतना पानी है कि अगली बारिश तक लोगों की जरूरत मजे से पूरी हो जाएगी. और अभी बारिश का दौर जरी है.तालाब के पानी का यहां ऐसा पुख्ता और बेहतर प्रबंधन किया गया है, जो एक सूखे प्रदेश में जल संरक्षण के अच्छे खासे सबक की तरह है.
पानी की अहमियत इस गांव ने 1984 में ही समझ ली थी. उन दिनों तालाब में पालतू पशुओं का डेरा जमा रहता था. नतीजाः पानी में सड़न, गंदगी और दुर्गंध. गांव के घरघर में चमड़ी का खतरनाक नारू रोग फैलने लगा, जो कि सड़ते पानी में पनपे एक परजीवी से पैदा होता है.
पेयजल के  लिए भी स्थिति विकराल हो गई. बड़े बूढ़ों ने तालाब के किनारे बैठकर विचार किया और नागौरी कौमी फंड नाम की कमेटी गठित की. कमेटी के अध्यक्ष हाजी मोहम्मद कासम कश्मीरी बताते हैं, ”दरदर की ठोकरें खाने की बजाए हमने तालाब से ही समाधान निकालने की सोची.” कमेटी ने सबसे पहले तालाब की खुदाई करवाकर उसकी चारदीवारी बना दी. इससे पानी साफसुथरा रहने लगा. लेकिन गांव के एक वर्ग का इस साफसुथरे पानी पर एकाधिकार सा हो गया. गरीब क्या करे? पानी सबको मिले, इसके लिए सबसे पहले तालाब पर 3,000 रु. की तनख्वाह पर एक चौकीदार नियुक्त किया गया.
इसके अलावा गांव के 4,000 परिवारों के लिए कूपन छपवाए गए. महीने की पहली तारीख को कूपन बांटे जाते हैं. प्रति परिवार 11 कूपन. एक कूपन में एक टैंकर पानी. सप्लाई के लिए 10-12 टैंकर हैं. कूपन भी पानी की उपलब्धता देखकर दिए जाते. गर्मी के मौसम में तीन महीने में एक कूपन.
यह व्यवस्था आराम से चलने लगी. इस बीच कई लोगों क शिकायतें आईं कि उन्हेंसाल में 4 कूपन दिए गए लेकिन पड़ोसी को पांच मिले. समस्या पैर फैलाती, उससे पहले ही कुशल प्रबंधन का परिचय देते हुए कमेटी ने इसका निराकरण कर लिया.
सभी परिवारों के लिए राशन कार्ड बनवाए गए. इसमें पानी दिए जाने वाले महीने के सामने और उस महीने के कूपन दोनों पर मोहर लगाई जाने लगी. अब किसको कितना पानी मिला, उसका रिकॉर्ड कमेटी के रजिस्टर और परिवार के  राशन कार्ड दोनों में दर्ज होता है. टैंकर वाले मनमानी न करें, इसके  लिए उन्हें हिदायत दी गई. गांव के किसी भी कोने तक पानी ले जाने का किराया 130 रुपए. तालाब के चौकीदार, राशन, कूपन और साफसफाई के  लिए गांव वालों के अलावा उन लोगों का सहयोग लिया जाता है, जो गांव के बाहर व्यवसाय करते हैं.
पानी चोरों के खिलाफ भी सख्त कदम उठाए गए. एक बार चौकीदार से मिलीभगत कर टैंकर वाला बिना कूपन के ही पानी लिए जा रहा था. गांववालों ने उसे पकड़ा और 2,200 रु. जुर्माने के साथ पानी भरने के लिए उस पर हमेशा के लिए पाबंदी लगा दी. चौकीदार को भी हटा दिया गया.
तालाब का पानी भविष्यमें कम न पड़े और न ही पानी की आवक कम हो, इसके लिए भी कमेटी के लोगों ने दूरदृष्टि अपनाई. खजांची शौकत अली बताते हैं, ”कमेटी ने पिछले दिनों 20 बीघा जमीन खरीदी, अंगोर (यानी कि पानी आने के रास्ते) के लिए. सरकारी रिकॉर्ड में भी इसे इसी नाम से दर्ज करवा दिया गया है.” 25 साल से तो बासनी गांव में पानी का कोई संकट पैदा हुआ नहीं. आवक का रास्ता बन जाने के बाद आगे भी शायद ही ऐसी नौबत आए.

Wednesday, 15 July 2015

कुरान की आयत को मिटाना कैसा ह

☝ जो लोग ये कहते है कि कुरआन की आयात सेल फोन��(मोबाईल) से  Delete (डिलीट)करना कयामत की निशानियों मे से है। उसका मुख़्तसर सा जवाब।����
�� कुरआन की आयात या दीनी massage को delete करना कैसा है ? ��
������हदीस:-:-
अमल का दारोमदार नियत पर है और हर शख्स को वही मिलता है जिसकी वो नियत करे ! ��
{सही बुखारी शरीफ-हदीस न..5070}
तो अगर आप किसी आयत या दीनी massege को Delete करते हो तो आपकी नियत गलत नहीं होती इसलिए गुनाह नहीं होगा !!✨
��आजकल Whatsapp पर इस तरह के बहुत सारे Massage आते रहते हैं । ✨
����मेरे दोस्तों सबसे पहली बात तो ये समझले कि कुरआन ए करीम को न मिटाया जा सकता है और न इसमें रहती दुनिया तक कोई तबदिली आ सकती है क्योकि इस मुक़द्दस किताब कुरआन की हिफाज़त की जिम्मेदारी खुद खुदा ने ली है।अल्लाह खुद कलामे पाक में फरमाता है कि- "हमने इस कुरआन को नाज़िल किया और हम ही उसकी हिफाज़त करने वाले(और निगेहबान)है।"(��सूरः हिज्र 9 पारा 14)✨
��अब आप बताओ मेरे ��दोस्तों कि अल्लाह जिस चीज़ की हिफाज़त करे उसे मिटाया या बर्बाद कैसे किया जा सकता है।✨
����दूसरी बात ये कि कुरआन के मिटाने की जहाँ तक बात है या डिलीट करने की तो दोस्तो जब हमें मदरसे में पढ़ाया जाता है तो ब्लैक बोर्ड पर कुरआन की आयतों को लिख कर बच्चों को समझया जाता है और फिर दूसरी आयत लिखने के लिए पहली आयत मिटा दी जाती है !��
♻अगर इस बात को देखा जाये तो यहाँ भी डिलीट या मिटाने का सिस्टम है तो इस हिसाब से मदरसे को भी बंद कर देना चाहिए !✨
��दोस्त अगर आपके या मेरे घर में या किसी भी मुस्लिम के घर में बहुत पुराना ज़ईफ कलामे पाक हो और बेहद खस्ता हालत में हो जिसके सफे निकल रहे हों तो ऐसी हालत में उसे आप क्या करेंगे ?✨
��ऐसी हालत में उसे नदी में बहाया जाये या फिर किसी कुएं में डाला जाए तब तो लोग ऐसा कहेंगे की ये लो ये तो पूरा कुरआन ही मिटा दिया !
����कुरआन की आयतों को मिटा देने का मतलब ये नही की तुम अपने हाथों से कुरआन को लिखोगे और मिटा दोगे।
बल्कि कुरआन की आयते मिटा देने का मतलब ये है कि तुम उसे पढ़ोगे फिर भी उस पर अमल नही करोगे।
��खुद हज़रत उसमान गनी रज़िo के वक़्त कुछ ज़ाईद नुस्को को जलाया भी गया था।✨
♻��फिर सिर्फ हाथ से लिखकर मिटा देना या नेट सेल फोन पर टाईप करके Delete कर देना से कोई फर्क नही पढ़ेगा. इन्शाअल्लाह।����
��कुछ लोगों का ये भी कहना है के मोबाईल पाक नहीं होता और सही गलत चीजें मोबाईल में रहती इसलिए कुरआन की आयतों को मोबाईल में नहीं रखना चाहिए !✨
���� हम मानते है कि मोबाईल में कुछ लोग गलत चीजें भी रखते हैं और कुरआन की आयतों को भी रखते हैं लेकिन यह मसला तो हमारी ज़ुबान का भी है ज़ुबान से तो हम गाली गलोज भी करते हैं गीबत भी करते हैं झूठ भी बोलते हैं चुगली भी करते हैं और फिर उसी ज़ुबान से कुरआन ए पाक की तिलावत भी करते हैं !✨
����तो ऐसे हाल में क्या कोई ये कहेगा के ज़ुबान कटवा देनी चाहिए या फिर कुरआन की तिलावत उस ज़ुबान से नहीं करनी चाहिए !दोस्तों ऐसा कहना तो बेवकूफी होगा !✨
��मेरे दोस्तों इस तरह के Massage इस्लाम के दुश्मनों की तरफ से भेजे जाते हैं और भोले भाले हमारे मुस्लिम भाई बीना सोंचे समझे उसे आगे फॉरवर्ड करते जाते हैं जिसकी वजह से जो भी इस्लाम की जानकारी एक दूसरे को मिल रही होती है वो भी मिलना बंद हो जाती है और दुश्मन अपनी चाल में कामयाब हो जाता है !✨
����मेरे दोस्तों आज इस्लाम दुनिया के हर कोने कोने में बहुत तेजी से फ़ैल रहा है इसलिए दुश्मनाने इस्लाम इसे रोकने की हर तरह की कोशिश करते रहते हैं लेकिन तारीख़ गवाह है हर दौर में हमारी खिलाफत रही है ! पर शर्त ये है के हम अल्लाह के हुक्म और नबी की सुन्नतों पर चलने वाले सच्चे मोमिन बन जाएँ । ✨
��अल्लाह हम सबको सही समझ अता फरमाए और गलत सही की पहचान करने की तौफीक अता फरमाए !!✨
          आमीन!!
♻ये बात सभी को बताए ताकि हमारे भाई गुमराह ना हो।✨

Sunday, 7 June 2015

क़ज़ा ऐ उमरी

कजाए उमरी और उसका आसान तरीका:-
यहाँ पर हम उन लोगो के लिए जिनकी तमाम उम्र में कई बरस की नमाज़े कज़ा हुई और अब अल्लाह तआला ने तौफीक दी की अदा करे तो उनके लिए कजाए उमरी और उसका आसान तरीका आला हजरत इमाम अहमद रजा खाँ फाजिले बरेलवी रहमतुल्लाह अलैहि के हवाले से लिख रहे है-
कज़ा नमाजे जल्दी से जल्दी अदा कर लेनी चाहिये, मालूम नहीं किस वक़्त मौत आ जाए, क्या मुश्किल है एक दिन की 20 रकअत होती है,
यानि फजर की 2, जोहर की 4, असर की 4, मगरिब की 3, ईशा की 4 फर्ज और 3 वित्र.,
इन नमाज़ों को सिवा तुलू और गुरुब और जवाल     (की इस वक़्त सजदा हराम है) हर वक़्त अदा कर सकता है.!
मसलन जेसे 100 बार की फर्ज नमाज़ कजा हो तो हर बार यूं कहे की सब से पहले जो फर्ज़ मुझ से कज़ा हुई, हर बार यही कहे., यानि जब एक अदा हुई तो बाकियो में जो सबसे पहले है....!
नमाज़ को छोटा करके पढ़ना जिससे जल्दी से अदा हो जाए उसका तरीका ये है की:----
खाली रकअतो यानि फर्ज़ की वह बाद वाली रकअत जिनमे सिर्फ अलहम्दु शरीफ पढ़ते है
उनको खाली कहते है यानि आखरी की तीसरी और चौथी में बजाये अल्हम्दु शरीफ के एक बार "सुब्हानल्लाह" कहे,
रूकू और सजदे में भी एक-एक बार "सुब्हाना रबिअल अजीम", और "सुब्हाना रब्बिअल अअला" पढ़ लेना काफी है...!
अत्तहीयात के बाद दोनों दुरुद शरीफ की जगह
** अल्लाहुम्मा सल्लि अला सय्यिदिना मोहम्मदियूँ वा आलिही** पढ़ना काफी है..!
वित्र में दुआ ऐ कुनुत की जगह एक बार रब्बिगफिरलि कहना काफी है...!
ये है आसान तरीका

      

मनाजात


مناجات
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या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो !
जब पड़े मुश्किल शहे मुश्किल कुशा का साथ हो !!

या इलाही भूल जाऊं नज़ा की तकलीफ़ को !
शादी-ए-दीदारे हुस्ने मुस्तफ़ा का साथ हो !!

या इलाही गोरे तीरा की जब आए सख़्त रात !
उन के प्यारे मुँह की सुबहे जांफ़िज़ा का साथ हो !!

या इलाही जब पड़े मह्शर में शोरे दार-व-गीर !
अमन देने वाले प्यारे मुस्तफ़ा का साथ हो !!

या इलाही जब ज़बानें बाहर आएं प्यास से !
साक़ी-ए-कौसर शहे जूद-व-अता का साथ हो !!

या इलाही गर्मी-ए-मह्शर से जब भड़कें बदन !
दामने महबूब की ठंडी हुआ का साथ हो !!

या इलाही रंग लाऐं जब मरी बेबाकियां !
उन की नीची नीची नज़रों की हया का साथ हो !!

या इलाही जब बहें आँखें हिसाबे जुर्म से !
उन तबस्सुम रेज़ होंटों की दुआ का साथ हो !!

या इलाही जब सरे शमशीर पर चलना पड़े !
रब्बे सल्लिम कहने वाले पेशवा का साथ हो !!

या इलाही जब रज़ा ख़्वाबे गिरां से सर उठाए !
दौलते बेदारे हुस्ने मुस्तफ़ा का साथ हो !!
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مناجات
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یا الہٰی ہر جگہ تیری عطا کا ساتھ ہو !
جب پڑے مشکل شہ مشکل کشا کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی بھو ل جاؤں نزع کی تکلیف کو !
شادی دیدار حسن مصطفی کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی گور تیرہ کی جب آئے سخت رات ! 
ان کے پیارے منہ کی صبح جانفزا کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی جب پڑے محشر میں شور داروگیر !
امن دینے والے پیارے مصطفی کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی جب زبانیں باہر آئیں پیاس سے !
ساقی کوثر شہ جود و عطاکا ساتھ ہو !!

یا الہٰی گرمی محشر سے جب بھڑکیں بدن !
دامن محبوب کی ٹھنڈی ہوا کا ساتھ ہو !!
یا الہٰی رنگ لائیں جب مری بیباکیاں !
ان کی نیچی نیچی نظروں کی حیا کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی جب بہیں آنکھیں حساب جر م سے !
ان تبسم ریز ہونٹوں کی دعا کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی جب سر شمشیر پر چلنا پڑے !
ربِّ سَلِّم کہنے والے پیشوا کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی جب رضا خواب گراں سے سر اٹھائے !
دولت بیدار حسن مصطفی کا ساتھ ہو

Monday, 30 March 2015

पंचायती राज के पेरुकार विनोदा बाबू


पंचायती राज के माध्यम से जनकल्याण के कार्यक्रमों को प्रत्येक घर में पहुंचाने के लिए विनोदा बाबू सदा तत्पर रहे. उनके कार्ययोजना की प्रशंसा हारून रसीद ने भी की है. उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकारों कृषि राज्यस्व की दृष्टि से पंचायती राज्य बहुत ही महत्वपूर्ण था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी ने इनके मरणो उपरान्त कहा था- जिन्होंने भी विनोदा बाबू के साथ काम किया है वे गम्भीर रूप से उनसे प्रभावित हुए. वे महान देशभक्त विद्वान और अनुभवी सहकर्मी थे, जो अपनी निष्ठा और ईमानदारी के कारण सम्माननीय थे. बिहार में विनोदानन्द झा जी पितृकल्प पुरुष थे, जिनकी विधायक तथा मुख्यमंत्री के रूप में प्रांत की सेवा और दूरदृष्टि वाले राजनेता के रूप में समस्त देश की सेवा सर्वज्ञात थी.
यहां हम आपके सामने पंचायत को लेकर उनके विचारों को भी प्रस्तुत कर रहे हैं:
विनोदा बाबू कहते थेे
मूल उद्देश्य है पंचायत स्थापना का, वह उद्देश्य अभी दूर है और लक्ष्य स्थान से भी बहुत दूरी पर है. इसलिए, किसी भाई को यदि वतर्मान प्रगति से असंतोष होता है, तो उस असंतोष को समझना चाहिए, उसकी कदर करनी चाहिए. पंचायत यद्यपि शासन-यंत्र तथा विकास-कार्य के लिए इतना ही नहीं कि पंचायत कानून के अन्तर्गत जो कुछ अधिकार उसे दिया गया, उसको काम में लाने के लिए एक छोटा-सा संगठन गांव में हो. पंचायत स्कीम की जो आत्मा है, जो स्पिरिट है, उसको काम मेें लाने के लिए हमें  कोशिश करनी होगी. सफलता सभी हमलोगों को मिलेगी. यदि हम संगठन का सामंजस्य, जो मौजूदा संगठन-शासन संगठन के रूप में है, उसके साथ हो यानी मौजूदा शासन भी ऐसी मौलिक जगह पर हो, इस तरह से उसमें परिवर्तन होते जायें कि पंचायत का काम एक अनहोनी-सा, एक असम्भव नहीं प्रतीत हो, लेकिन नये भारतवर्ष की नवीन शासन-पद्धति का एक वास्तविक, व्यावहारिक और ठोस अंग के रूप में हो, तो यह काम तो आसान नही है.
फिर भी कोई शासन-यंत्र है. अभी उसमें और आप में बहुत सी बुराई की बातें हैं. यदि आज उनके पुन:संगठन की बात सोची जाती है, तो इसलिए नहीं कि उसमें बुराई भरी हुई हैं. ऐसी बात नहीं, बल्कि इसलिए कि जिन दिनों में यह शासन-यंत्र लाया गया था, उस दिन राज्य का उद्देश्य था सिर्फ पशु-शक्ति से, ताकत से, बंदूक की ताकत से, लाठी की ताकत से जनता के ऊपर हुकूमत करना और उसकी व्यवस्था थी पुलिस स्टेट की, यानी उस समय पुलिस की मदद से फौज की मदद से, आदमियों को अपने कब्जे में रखना था. आज हमारे देश में जो क्रान्ति आयी और उस क्रान्ति के परिणामस्वरूप हमें जो नया संविधान मिला, उस संविधान में पुलिस स्टेट की जगह पर एक वेलफेयर स्टेट, एक डेमोक्रेटिक स्टेट का ही यदि लक्ष्य आज रखा गया हमारे संविधान में तो जितना ऐडमिनिस्ट्रेशन का सिलसिला है, शासन करने का सिलसिला है, उसमें भी इस दृष्टिकोण से आवश्यक सामंजस्य लाना चाहिए.
लाठी और बन्दूक की प्रधानता अब शासन में नही रही. लाठी और बन्दूक तो रहेगी. जब तक कुछ-न कुछ ऐसे आदमी है. जिनको युक्ति से रास्ते पर नही लाया जा सकता. ये लोग जो हमेशा समाज में उलट-पलट करने की बात हिंसात्मक रीति से सोचने है, उनके मुकाबले के लिए, हिंसात्मक तरीका अख्तियार करने को स्टेट भी बाध्य होता है लेकिन अमूमन हम प्रजातांत्रिक सिद्धांतों में विश्वास करते है, फिर वेलफेयर स्टेट की स्थापना करते है, तो नागरिक की भलाई के सिवा, उनके विकास के सिवा दूसरा कोई काम नही. तो, स्टेट के फंक्शन करने का, इसके काम करने का जो तरीका है, इसमें भी, एडमिनिस्ट्रेशन का जो तरीका है, उसमें भी उसके उद्देश्य के साथ सामंजस्य नही होगा. तो ऐसी हालत में दोनों में जो संघर्ष होता है, उसी तरह का एक व्यावहारिक संघर्ष एक नैतिक संघर्ष जैसा संघर्ष अभी देखते है वैसा होता है.
आज मैैने क्यों चुनाव बन्द किया, क्योंकि पंचायत में जो 900 चुनाव बाकी है, यदि मै होने दूँ तो हमें डर है कि दूषित वातावरण पैदा हो जायेगा. जेनरल एलेक्शन, जो आने वाला है, 5-6 महीने के बाद इसका असर जेनरल एलेक्शन पर पड़ेगा. जेनरल एलेक्शन में निर्वाचन के समय, आदमियों के सामने उनके देश का सवाल रखूंगा, उसके बच्चों को पढ़ाने का सवाल रखूंगा, उनकी बेकारी दूर करने का सवाल रखूंगा और अपने देश की रक्षा की बात रखूँगा. इन सारी बातों  को जब उनके सामने फैलने के लिए रखूंगा, उस समय यदि पंचायत का चुनाव, जैसा हो रहा था, जैसा चुनाव अमहरा में हुआ, जैसा चुनाव सेवरा गांव, मुंगेर में हुआ, जैसा चुनाव मुजफ्फरपुर में किसी तरह हुआ, जिसकी रिपोर्ट हमें याद है, तो एक ही चीज सामने आती है कि किस जाति को जगह पर जाना चाहिए.
एक नया समाज बनाने की जो प्रथम चिंगारी होती है, आप वही एक चिंगारी हैं. आप उसी काम को कर रहे है जो कि जमीन को पहले-पहले खेती के लिए तोड़ने वाला करता है. उसकी जो कृति होती है, उसकी जो प्रतिष्ठा होती है,आपकी प्रतिष्ठा वही है. इसमें जहाँ-जहाँ बाधाएं हो, कठिनाइयां हो, आपस में पहले बातें करें, अधिकार से बाद में. ठंडे से, घबराहट से नही. कभी कम्प्लेक्स लेकर बात नही करनी चाहिए. किसी के पास जायें बात करने के लिए तो अपने को छोटा समझ कर भी नही जाना चाहिए और न अपने को बहुत बड़ा समझ कर ही जाना चाहिए. इसे बार-बार आपसे कहा है और आज भी दोहराता हूँ कि हर पंचायत को किताब रखनी चाहिए. उस किताब में बीडीओं से क्या बातें हुई, क्या परिणाम निकला? उन्होने  क्या राय दी, नोट करना चाहिए. आज जो मुखिया हो, हो सकता है वे कल चले जाये. आज जो बीडीओं है, हो सकता है कल बदल जायें, तो दूसरे के लिए,गाइडेंस के लिए, किताब रखनी चाहिए साथ-साथ काम का इंस्पेक्शन होते रहना चाहिए. इंस्पेक्शन के लिए उन्होंने कहा, साल में एक मरतबे होगा, तो उससे संतोष नही करना चाहिए. इनके पास स्टाफ कम है, ये साल में एक मरतबे जरूर देखें. लेकिन मुखिया को अपना दफ्तर प्रति माह देखना चाहिए. इनको माह में सिनेमा नहीं देखना चाहिए. उसके ऑफिस में ग्राम-सेवक कमर्चारी रक्षा दल के सेवकों को मालूम होना चाहिए कि महीने में पहला रविवार, रविवार को काम नही होता है, उस दिन मुखिया दो घंटा, सरपंच दो घंटा बैठक कर दफ्तर देखेगा. कितना पन्ना खर्च है? कितनी नीबें है, कितनी खर्च हुई, कितनी रोशनाई है, कितनी खर्च हुई, कितना पैसा है और कहां गया? यह सब खूब मजबूती के साथ इंस्पेक्शन करना चाहिए और इंस्पेक्शन करके  उसके परिणाम को रखना चाहिए. यह पंचायत कमेटी के सामने पेश होना चाहिए, तो उससे सिलसिला आ जायेगा और कहीं यदि कुछ गफलत हो, भूल हो, तो वह दुरुस्त हो जायेगा. यह मेथड आयेगा, आपस में एक तसल्ली भी होगी. लोगों के ऊपर, जो काम नही करते है, उनके ऊपर एक दहशत भी होगा कि मालिक चैतन्य है, देखता है. उसी तरह से एक महीने में हो, दो महीने में हो, जैसा भी हो करना चाहिए. कभी पड़ोस की पंचायत के मुखिया को निमंत्रण देना चाहिए कि आओ और हमारी पंचायत को देख जाओ. कुछ गलती तुम्हें मालूम हो, कुछ भी कमी हो या कुछ और हम कर सकते है या नहीं इस पर परामर्श दे जाओ. तो इस तरह से बराबर आना-जाना चाहिए, उनसे राय-मशवरा लेना चाहिए. पंचायतों को अपने अन्दर की जो ताकत है, उसको डेवलप करना चाहिए. उसका विकास करना चाहिए. यदि वह विकसित होगी, तो बाहर की पंचायत की मांग बहुत कम होगी, आवश्यकता भी कम हो जायेगी, जरूरत भी नही रहेगी और कुछ बढि़या, सुन्दर समाज नीचे से बनता हुआ आयेगा. तो हमलोग सब अपने ढंग से काम करें. सब कोई सुन्दर ढंग से, अपने-अपने तरीेके से अपने तरीके को बनवावें और चलावें. इसी तरह के काम होता हैं. किस तरह से सरल ढंग से बढि़या से काम हो, यह देखना है. बहुत ज्यादा फाइल का महत्व नहीं रखना चाहिए. हमलोग सेक्रेटेरियट में फाइल के अन्दर हैं. इतनी फाइलों को हमलोगों ने बनाया है और दस्तखत किया है कि 1936 से जितनी फाइलें एक हमारे हाथ में गुजरी है, वे हमारी लाश को जलाने के लिए काफी हो सकती है, लेकिन कितना कागज इसमें व्यर्थ खर्च हुआ है, इसका भी असर हम पर है. एक बगल के कमरे में रहता है ऑफिसर, वह तीन पन्ने का नोट लिखता है और उसकी कटान में हम दस लाइन, छह लाइन लिखते हैं. इसी तरह से चलता रहेगा छह महीने तक. बैठक करके, गुफ्तगू से मामला तय कर ले. आपस में दो लाइन में बात खत्म हो जाए, यह परिपाटी होनी चाहिए क्योंकि, हम बहुत बुद्धिमतापूर्ण साहित्य से भरे हुए नोटों से पेट भरने वाले नही हैं. उन नोटों से परिणाम क्या निकलता है, उसी से हमारा सिर्फ सरोकार है. तो, यह चीज आपके अन्दर नहीं है. अपने ढंग से चीज निकालें सभी चीजों में, आपस में बात करके जो रास्ता हो, निकालो.

मोहम्मद अली बादर वाला

पंचायत के बारे में कुछ जानकारी


वार्ड सदस्य की जिम्मेवारियां बतायें?

वार्ड सदस्य ग्राम पंचायत का सदस्य होता है. वह अपनी पंचायत की बैठक में अपने वार्ड व गांव का प्रतिनिधित्व करता है. वह विभिन्न समितियों के गठन में भाग लेता है  और सर्वसम्मति से उसे जिस समिति का अध्यक्ष चुना गया हो, उसकी अध्यक्षता भी करता है. गांव वासियों के विकास के लिए योजनाओं के चयन व क्रियान्वयन की प्राथमिकता तय करना, ग्राम पंचायत के विकास के लिए सरकार द्वारा उपलब्ध राशियों के समुचित आवंटन में मुखिया की मदद करना उसकी जिम्मेवारी है.  पंचायती राज के तहत सौंपे गये अन्य दायित्वों का निर्वाह भी उसे करना होता है. उसके कई सामाजिक दायित्व भी होते हैं. जैसे उसे अपने वार्ड-गांव की ग्रामसभा के साथ बैठक कर योजना तैयार करना होता है. गांव में ग्रामसभा द्वारा तैयार की गयी योजनाओं को ग्राम पंचायत की बैठक में भी प्रस्तुत करना होता है. ग्राम पंचायत की बैठक में योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए प्राथमिकता तय करते समय अपने वार्ड-गांव के लिए योजनाओं को प्राथमिकता दिलाना भी उसका दायित्व होता है. योजनाओं के क्रियान्वयन में मदद, ग्रामसभा के लिए निर्णय व प्रस्ताव को ग्राम पंचायत व मुखिया तक पहुंचाना, गांव या वार्ड क्षेत्र के संबंध में पंचायत सचिवालय या मुखिया द्वारा लिये गये निर्णय के संबंध में लोगों को बताना, पंचायत में उपलब्ध मद की राशि की जानकारी गांव को देना, ग्रामसभा द्वारा पंचायत से मांगी गयी उन समस्त जानकारियों को उपलब्ध कराना, जो गांव अथवा पंचायत के ग्रामीणों से संबंधित हों, उसकी जिम्मेवारी है. ग्रामसभा और ग्राम पंचायत के बीच प्रगाढ़ कड़ी का काम करना उसका दायित्व है. 

पंचायत समिति सदस्यों के अधिकार, कर्तव्य एवं दायित्व क्या हैं?

पंचायत समिति में अपनी पंचायत के अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में पंचायत समिति सदस्य प्रतिनिधित्व करता है. स्थायी समिति के दायित्व का निर्वहन, पंचायत समिति की प्रत्येक बैठक में भाग लेना, गांव की बुनियादी समस्याओं के प्रति पंचायत समिति का ध्यान आकृष्ट कराना उसकी जिम्मेवारी है. सरकारी योजनाओं की जानकारी पंचायत एवं गांव स्तर पर लोगों को प्रदान करना, पंचायत समिति स्तर पर प्रखंड क्षेत्र एवं ग्राम पंचायत के लिए योजनाओं की प्राथमिकता तय करते समय अपनी पंचायत की योजनाओं को प्राथमिकता सूची में सम्मिलित कराने में विशेष भूमिका निभाना, अपनी पंचायत के जरूरतमंदों को सरकार की ओर से मिलने वाली विभिन्न जन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिलाना एवं शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी, कृषि विकास के लिए योजनाओं के निर्माण एवं क्रियान्वयन में योगदान देना उसके कर्तव्य हंै.

जिला परिषद सदस्य के क्या कर्तव्य, अधिकार व दायित्व हैं?

जिला परिषद सदस्य अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं, जरूरतों व आवश्यक योजनाओं की मांग जिला परिषद की बैठक में उठाता है. उसे जिला परिषद की बैठक में भी शामिल होना होता है व वहां अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करना होता है. उसे जिला परिषद द्वारा गठित स्थायी समितियों के सदस्य, सभापति, उपसभापति के रूप में दायित्व निभाना होता है. जिला परिषद के अधीनस्थ कार्यालयों, उनके अधिकारियों, कर्मचारियों का पर्यवेक्षण व नियंत्रण करने में जिला परिषद अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का सहयोग करना, समय-समय पर ऐसे कर्मचारियों-अधिकारियों का स्वयं भी पर्यवेक्षण, निरीक्षण व नियंत्रण करना उसकी जिम्मेवारी है. जिला परिषद सदस्यों के कई सामाजिक दायित्व भी होते हैं. उसे अपने निर्वाचन क्षेत्र अथवा प्रखंड की बुनियादी समस्याओं को जिला परिषद के समक्ष प्रस्तुत करना होता है, प्रखंड स्तर पर पूरी नहीं हो सकने वाली योजनाओं-परियोजनाओं को जिला परिषद विकास निधि के द्वारा क्रियान्वित कराना, प्रखंड के लोगों के विकास के लिए अधिकाधिक योजनाओं को जिला परिषद से स्वीकृति दिलाना और उन्हें प्रखंड क्षेत्र में क्रियान्वित कराना, अपने प्रखंड केविकास लिए अधिकाधिक राशि का आवंटन पाना, प्रखंड के विकास से संबंधित किसी भी प्रकार की योजनाओं को जिला स्तर पर पास कराने के लिए लगातार सक्रिय रहना, अपने क्षेत्र अथवा प्रखंड के ग्राम वासियों के व्यक्तिगत अथवा सामूहिक कार्यों को जिला स्तर पर शीघ्र कराने में मदद करना उसका दायित्व है. बुनियादी जरूरतों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सिंचाई, जल प्रबंधन, सड़क, बिजली आदि की सुविधा समुचित तौर पर उपलब्ध हो इसके लिए प्रयास करना, पंचायत समिति व जिला परिषद के बीच सामंजस्य कायम कराना, सरकार की योजनाओं, नीतियों की जानकारी पंचायत समिति को देना, भ्रष्टाचार को खत्म करने का प्रयास करना उसका दायित्व होता है.