Sunday, 7 June 2015

क़ज़ा ऐ उमरी

कजाए उमरी और उसका आसान तरीका:-
यहाँ पर हम उन लोगो के लिए जिनकी तमाम उम्र में कई बरस की नमाज़े कज़ा हुई और अब अल्लाह तआला ने तौफीक दी की अदा करे तो उनके लिए कजाए उमरी और उसका आसान तरीका आला हजरत इमाम अहमद रजा खाँ फाजिले बरेलवी रहमतुल्लाह अलैहि के हवाले से लिख रहे है-
कज़ा नमाजे जल्दी से जल्दी अदा कर लेनी चाहिये, मालूम नहीं किस वक़्त मौत आ जाए, क्या मुश्किल है एक दिन की 20 रकअत होती है,
यानि फजर की 2, जोहर की 4, असर की 4, मगरिब की 3, ईशा की 4 फर्ज और 3 वित्र.,
इन नमाज़ों को सिवा तुलू और गुरुब और जवाल     (की इस वक़्त सजदा हराम है) हर वक़्त अदा कर सकता है.!
मसलन जेसे 100 बार की फर्ज नमाज़ कजा हो तो हर बार यूं कहे की सब से पहले जो फर्ज़ मुझ से कज़ा हुई, हर बार यही कहे., यानि जब एक अदा हुई तो बाकियो में जो सबसे पहले है....!
नमाज़ को छोटा करके पढ़ना जिससे जल्दी से अदा हो जाए उसका तरीका ये है की:----
खाली रकअतो यानि फर्ज़ की वह बाद वाली रकअत जिनमे सिर्फ अलहम्दु शरीफ पढ़ते है
उनको खाली कहते है यानि आखरी की तीसरी और चौथी में बजाये अल्हम्दु शरीफ के एक बार "सुब्हानल्लाह" कहे,
रूकू और सजदे में भी एक-एक बार "सुब्हाना रबिअल अजीम", और "सुब्हाना रब्बिअल अअला" पढ़ लेना काफी है...!
अत्तहीयात के बाद दोनों दुरुद शरीफ की जगह
** अल्लाहुम्मा सल्लि अला सय्यिदिना मोहम्मदियूँ वा आलिही** पढ़ना काफी है..!
वित्र में दुआ ऐ कुनुत की जगह एक बार रब्बिगफिरलि कहना काफी है...!
ये है आसान तरीका

      

मनाजात


مناجات
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या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो !
जब पड़े मुश्किल शहे मुश्किल कुशा का साथ हो !!

या इलाही भूल जाऊं नज़ा की तकलीफ़ को !
शादी-ए-दीदारे हुस्ने मुस्तफ़ा का साथ हो !!

या इलाही गोरे तीरा की जब आए सख़्त रात !
उन के प्यारे मुँह की सुबहे जांफ़िज़ा का साथ हो !!

या इलाही जब पड़े मह्शर में शोरे दार-व-गीर !
अमन देने वाले प्यारे मुस्तफ़ा का साथ हो !!

या इलाही जब ज़बानें बाहर आएं प्यास से !
साक़ी-ए-कौसर शहे जूद-व-अता का साथ हो !!

या इलाही गर्मी-ए-मह्शर से जब भड़कें बदन !
दामने महबूब की ठंडी हुआ का साथ हो !!

या इलाही रंग लाऐं जब मरी बेबाकियां !
उन की नीची नीची नज़रों की हया का साथ हो !!

या इलाही जब बहें आँखें हिसाबे जुर्म से !
उन तबस्सुम रेज़ होंटों की दुआ का साथ हो !!

या इलाही जब सरे शमशीर पर चलना पड़े !
रब्बे सल्लिम कहने वाले पेशवा का साथ हो !!

या इलाही जब रज़ा ख़्वाबे गिरां से सर उठाए !
दौलते बेदारे हुस्ने मुस्तफ़ा का साथ हो !!
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مناجات
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یا الہٰی ہر جگہ تیری عطا کا ساتھ ہو !
جب پڑے مشکل شہ مشکل کشا کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی بھو ل جاؤں نزع کی تکلیف کو !
شادی دیدار حسن مصطفی کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی گور تیرہ کی جب آئے سخت رات ! 
ان کے پیارے منہ کی صبح جانفزا کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی جب پڑے محشر میں شور داروگیر !
امن دینے والے پیارے مصطفی کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی جب زبانیں باہر آئیں پیاس سے !
ساقی کوثر شہ جود و عطاکا ساتھ ہو !!

یا الہٰی گرمی محشر سے جب بھڑکیں بدن !
دامن محبوب کی ٹھنڈی ہوا کا ساتھ ہو !!
یا الہٰی رنگ لائیں جب مری بیباکیاں !
ان کی نیچی نیچی نظروں کی حیا کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی جب بہیں آنکھیں حساب جر م سے !
ان تبسم ریز ہونٹوں کی دعا کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی جب سر شمشیر پر چلنا پڑے !
ربِّ سَلِّم کہنے والے پیشوا کا ساتھ ہو !!

یا الہٰی جب رضا خواب گراں سے سر اٹھائے !
دولت بیدار حسن مصطفی کا ساتھ ہو