♤ बासनी ♤
इस मुस्लिम बहुल्य गांव से समझे पानी की एक-एक बूंद की कीमत
इस मुस्लिम बहुल्य गांव से समझे पानी की एक-एक बूंद की कीमत
गर्मी का मौसम अब नागौर के बासनी गांव के लोगों को कतई परेशान नहीं करता. वहां के लोग तो बल्कि दावा करते हैं कि उनके गांव में पीने के पानी की समस्या पैदा हो ही नहीं सकती
असल में बासनी के परंपरागत पेयजल स्रोत गोरधन तालाब में इतना पानी है कि अगली बारिश तक लोगों की जरूरत मजे से पूरी हो जाएगी. और अभी बारिश का दौर जरी है.तालाब के पानी का यहां ऐसा पुख्ता और बेहतर प्रबंधन किया गया है, जो एक सूखे प्रदेश में जल संरक्षण के अच्छे खासे सबक की तरह है.
पानी की अहमियत इस गांव ने 1984 में ही समझ ली थी. उन दिनों तालाब में पालतू पशुओं का डेरा जमा रहता था. नतीजाः पानी में सड़न, गंदगी और दुर्गंध. गांव के घरघर में चमड़ी का खतरनाक नारू रोग फैलने लगा, जो कि सड़ते पानी में पनपे एक परजीवी से पैदा होता है.
पेयजल के लिए भी स्थिति विकराल हो गई. बड़े बूढ़ों ने तालाब के किनारे बैठकर विचार किया और नागौरी कौमी फंड नाम की कमेटी गठित की. कमेटी के अध्यक्ष हाजी मोहम्मद कासम कश्मीरी बताते हैं, ”दरदर की ठोकरें खाने की बजाए हमने तालाब से ही समाधान निकालने की सोची.” कमेटी ने सबसे पहले तालाब की खुदाई करवाकर उसकी चारदीवारी बना दी. इससे पानी साफसुथरा रहने लगा. लेकिन गांव के एक वर्ग का इस साफसुथरे पानी पर एकाधिकार सा हो गया. गरीब क्या करे? पानी सबको मिले, इसके लिए सबसे पहले तालाब पर 3,000 रु. की तनख्वाह पर एक चौकीदार नियुक्त किया गया.
इसके अलावा गांव के 4,000 परिवारों के लिए कूपन छपवाए गए. महीने की पहली तारीख को कूपन बांटे जाते हैं. प्रति परिवार 11 कूपन. एक कूपन में एक टैंकर पानी. सप्लाई के लिए 10-12 टैंकर हैं. कूपन भी पानी की उपलब्धता देखकर दिए जाते. गर्मी के मौसम में तीन महीने में एक कूपन.
यह व्यवस्था आराम से चलने लगी. इस बीच कई लोगों क शिकायतें आईं कि उन्हेंसाल में 4 कूपन दिए गए लेकिन पड़ोसी को पांच मिले. समस्या पैर फैलाती, उससे पहले ही कुशल प्रबंधन का परिचय देते हुए कमेटी ने इसका निराकरण कर लिया.
सभी परिवारों के लिए राशन कार्ड बनवाए गए. इसमें पानी दिए जाने वाले महीने के सामने और उस महीने के कूपन दोनों पर मोहर लगाई जाने लगी. अब किसको कितना पानी मिला, उसका रिकॉर्ड कमेटी के रजिस्टर और परिवार के राशन कार्ड दोनों में दर्ज होता है. टैंकर वाले मनमानी न करें, इसके लिए उन्हें हिदायत दी गई. गांव के किसी भी कोने तक पानी ले जाने का किराया 130 रुपए. तालाब के चौकीदार, राशन, कूपन और साफसफाई के लिए गांव वालों के अलावा उन लोगों का सहयोग लिया जाता है, जो गांव के बाहर व्यवसाय करते हैं.
पानी चोरों के खिलाफ भी सख्त कदम उठाए गए. एक बार चौकीदार से मिलीभगत कर टैंकर वाला बिना कूपन के ही पानी लिए जा रहा था. गांववालों ने उसे पकड़ा और 2,200 रु. जुर्माने के साथ पानी भरने के लिए उस पर हमेशा के लिए पाबंदी लगा दी. चौकीदार को भी हटा दिया गया.
तालाब का पानी भविष्यमें कम न पड़े और न ही पानी की आवक कम हो, इसके लिए भी कमेटी के लोगों ने दूरदृष्टि अपनाई. खजांची शौकत अली बताते हैं, ”कमेटी ने पिछले दिनों 20 बीघा जमीन खरीदी, अंगोर (यानी कि पानी आने के रास्ते) के लिए. सरकारी रिकॉर्ड में भी इसे इसी नाम से दर्ज करवा दिया गया है.” 25 साल से तो बासनी गांव में पानी का कोई संकट पैदा हुआ नहीं. आवक का रास्ता बन जाने के बाद आगे भी शायद ही ऐसी नौबत आए.