विकेन्द्रीकरण की नीति के तहत अरबों रुपए सीधे ग्राम पंचायतों में जा रहे हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश में पंचायत स्तर पर कोई कार्यालय या पर्याप्त ज़िम्मेदार स्टाफ़ न होने से रोज़गार, ग्राम विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि की योजनाएं सही ढंग से लागू नहीं हो पा रही है.
स्टाफ़ की कमी से काम में देरी, अनियमितता और भ्रष्टाचार की शिकायतें आती रहती हैं.
ग्राम पंचायत की बैठक बुलाना, कार्यवाही लिखना, प्रस्ताव एवं कार्य योजना तैयार करना, बजट बनाना, खर्च करना, उसका लेखा जोखा रखना और प्रशासन से पत्राचार आदि का काम पंचायत सचिव का होता है.
लेकिन सरकार हर ग्राम पंचायत के लिए एक सचिव का भी बंदोबस्त नहीं कर पा रही है.
पंचायती राज विभाग के अधिकारियों के अनुसार उत्तर प्रदेश में मात्र 5689 पंचायत सचिव कार्यरत हैं, जबकि प्रदेश में 51963 निर्वाचित ग्राम पंचायतें और लगभग सवा लाख राजस्व ग्राम हैं. इन गाँवों के भी अनेक छोटे छोटे मजरे या पुरवे होते हैं.
काम चलाऊ व्यवस्था के तहत ग्राम विकास अधिकारियों से पंचायत अधिकारी का काम लिया जा रहा है.
पर ग्राम विकास अधिकारियों के 8297 स्वीकृत पदों के बदले केवल छह हज़ार कम कर रहे हैं. यानी ग्राम विकास अधिकारी के भी 2297 पद खाली हैं.
काम करने वाले नहीं
पंचायत सचिव और ग्राम विकास अधिकारी दोनों के मिलाकर भी केवल 11689 लोग काम कर रहे हैं , जबकि पंचायतें लगभग 52 हज़ार हैं.
इसका परिणाम यह है कि एक एक पंचायत सचिव के जिम्मे आधा दर्जन और उससे अधिक ग्राम पंचायतों का काम है. पंचायत सचिव ढूंढे नहीं मिलते.
भारत सरकार ने ठेके पर हर ग्राम पंचायत में रोज़गार सहायक के पद स्वीकृत किए हैं, जो मनरेगा का मास्टर रोल भरते हैं. लेकिन बाकी काम करने वाला कोई नहीं.
इन योजनाओं को तैयार करके उन्हें लागू करने की ज़िम्मेदारी निर्वाचित ग्राम प्रधान पर डाल दी जाती है, जबकि लगभग तीन चौथाई अर्थात 75 फ़ीसदी प्रधान सरकारी लिखापढ़ी और हिसाब किताब करने में सक्षम नहीं माने जाते हैं.
इनमें से बहुत तो लिखना पढ़ना नहीं जानते और हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगाते हैं. बड़ी संख्या में महिला प्रधान घूँघट में घर के अंदर रहती हैं.
ग्राम प्रधान कोई पूर्ण कालिक कर्मचारी नहीं है. वह एक तरह से स्वयं सेवी सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता होता है और उसे अपना परिवार चलाने के लिए रोज़ी- रोटी भी कमानी होती है.
शिकायतें
सबसे ज़्यादा दिक्कत मनरेगा से जुड़े काम को लेकर हैं
यह भी शिकायतें हैं कि समुचित प्रशासनिक मशीनरी के अभाव में पंचायत सचिव और ग्राम प्रधान बड़े पैमाने पर फ़र्ज़ी काम या मज़दूरी दिखाकर योजनाओं का पैसा हड़प जाते हैं.
पंचायत राज विभाग के अधिकारियों के अनुसार उत्तर प्रदेश में वर्ष 1979 में प्रत्येक न्याय पंचायत के लिए एक के हिसाब से पंचायत सचिव के 8135 पद स्वीकृत हुए थे. इनमे भी पंचायत सचिवों के 2454 स्वीकृत पद खली पड़े हैं.
तब पंचायतों के पास आज की तरह धन या योजनाएं नही थीं. उस समय इनका काम केवल पंचायतों की मीटिंग आदि का रिकॉर्ड रखना होता था.
74वें संविधान संशोधन के बाद पंचायती राज की विकेन्द्रित व्यवस्था में ग्राम पंचायतों के पास अनेक कार्य आ गए हैं.
इनमें पंचायती राज के अलावा सर्व शिक्षा अभियान, मिड डे मील, साफ़ सफाई, हैंड पम्पों का रख रखाव, वृद्धावस्था, विधवा, गरीब पेंशन, छात्र वृत्ति वितरण , राशन कार्ड तथा अन्य अनेक योजनाओं के लाभार्थियों का चयन एवं क्रियान्वयन शामिल है.
इन सबके अलावा गाँव में सड़क, खंडजा, नाली बनवाने का काम भी प्रधान के जिम्मे है.
नहीं हो पाता पैसा का सदुपयोग
ग्राम पंचायतों में स्टाफ़ की कमी वास्तव में कोई समस्या नही है. हाँ काफी अधिक धन जाने से दूसरी तरह की समस्याएं ज़रूर हैं.
मुकुल सिंघल, प्रमुख सचिव
सबसे ज़्यादा काम मनरेगा योजना का है. मनरेगा में रोज़गार कार्ड बनाना , कार्य की योजना बनाकर उसे क्रियान्वित करना और भुगतान शामिल है.
ग्राम विकास से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि औसतन हर ग्राम पंचायत को आबादी के अनुसार लगभग चालीस लाख और कहीं- कहीं सत्तर अस्सी लाख भी मिलते हैं.
ग्राम पंचायतों के काम काज की देखरेख खंड विकास कार्यालय से होती है. लेकिन उत्तर प्रदेश में खंड विकास अधिकारियों के १७० यानि लगभग बीस फीसदी पास खाली पड़े हैं.
मैंने इस विषय में प्रमुख सचिव मुकुल सिंघल से बात की. लेकिन उनका कहना था, " ग्राम पंचायतों में स्टाफ़ की कमी वास्तव में कोई समस्या नही है. हाँ काफी अधिक धन जाने से दूसरी तरह की समस्याएं ज़रूर हैं.’’
ज़ाहिर है कि दूसरी समस्याएं यही हैं कि न तो ठीक से कम होता है, न पैसे का सदुपयोग और न ही समुचित लेखा- जोखा और जवाब देही.
मनरेगा से जुड़े एक अधिकारी के अनुसार इतना काम कराने और उसका लेखा - जोखा रखने के लिए पंचायतों को सुदृढ़ करने का कम उत्तर प्रदेश में पिछले बीस सालों में नहीं हुआ.
इसकी एक वजह यह भी बताई जाती है कि उत्तर प्रदेश का राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही चाहते ही नहीं कि सत्ता का वास्तविक विकेन्द्रीकरण हो और निचले स्तर पर ठीक से काम हो, जिससे विभिन्न विभागों और जिला स्तरीय अधिकारियों का वर्चस्व और ग्राम प्रधानों पर पकड़ बनी रहे
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