Wednesday, 27 May 2020

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Monday, 11 May 2020

अरतुगुल गाज़ी 2

*⚔️🇹🇷सल्तनत ए उस्मानिया🇹🇷⚔️*

*पोस्ट नम्बर 2️⃣*

*गाजी अरतगल(Eutugrul) काय काबिले से थे उनके वालिद सुलेमान शाह काय काबिले के सरदार थे ,काय कबीले से सल्तनत ए उस्मानिया बनने तक ओर फिर उसके बाद 600 साल की तारीख पे आने से पहले में आपको तारीख की वो दर्दनाक दास्तान सुनाना चाहता हु जो सियाही से नही खून से लिखी गई*
 
*हलाकू का बगदाद पे हमला ओर उसके बाद मंगोलो का वहसी दरिंदापन सायद ही किसी शहर ने ऐसी तबाही देखी हो जो शहरे बगदाद ने देखी ,* 


*ख़िलाफ़त ए अब्बासिया ओर मंगोल हलाकू खान*


  *मंगोलों ने 1258 में बग़दाद पर किया था हमला.*

मंगोल फ़ौज ने पिछले 13 दिन से बग़दाद को घेरे में ले रखा था. जब प्रतिरोध की तमाम उम्मीदें दम तोड़ गईं तो 10 फ़रवरी सन 1258 को समर्पण के दरवाज़े खुल गए.

*37वें अब्बासी ख़लीफ़ा मुस्तआसिम बिल्लाह अपने मंत्रियों और अधिकारियों के साथ मुख्य दरवाज़े पर आए और हलाकू ख़ान के सामने हथियार डाल दिए.*

हलाकू ने वही किया जो उसके दादा चंगेज़ ख़ान पिछली आधी सदी से करते चले आए थे.

*उसने ख़लीफ़ा के अलावा तमाम आला ओहदेदारों को मौत के घाट उतार दिया और मंगोल सेना बग़दाद में दाख़िल हो गई.*

*इसके अगले चंद दिन तक जो हुआ उसका कुछ अंदाज़ा इतिहासकार अब्दुल्ला वस्साफ़ शिराज़ी के शब्दों से लगाया जा सकता है.*

वह लिखते हैं, "वो शहर में भूखे गधों की तरह घुस गए और जिस तरह भूखे भेड़िये भेड़ों पर हमला करती हैं वैसा करने लगे. बिस्तर और तकिए चाकूओं से फाड़ दिए गए. महल की औरतें गलियों में घसीटी गईं और उनमें से हर एक तातरियों का खिलौना बनकर रह गईं."

*दजला नदी के दोनों किनारों पर आबाद बग़दाद, अलीफ़ लैला का शहर, ख़लीफ़ा हारून अलरशीद का शहर था.*

इस बात का सही अंदाजा लगाना मुश्किल है कि कितने लोग इस क़त्लेआम का शिकार हुए. इतिहासकारों का अंदाज़ा है कि दो लाख से लेकर 10 लाख लोग तलवार, तीर या भाले से मार डाले गए थे.

*इतिहास की किताबों में लिखा है कि बग़दाद की गलियां लाशों से अटी पड़ी थीं. चंद दिनों के अंदर-अंदर उनसे उठने वाली सड़ांध की वजह से हलाकू ख़ान को शहर से बाहर तम्बू लगाने पर मजबूर होना पड़ा.*

इसी दौरान जब विशाल महल को आग लगाई गई तो इसमें इस्तेमाल होने वाली आबनूस और चंदन की क़ीमती लकड़ी की ख़ुशबू आसपास के इलाके के वातावरण में फैली बदबू में मिल गई.

*कुछ ऐसी ही दजला नदी में भी देखने को मिला. कहा जाता है कि उस नदी का मटियाला पानी कुछ दिनों तक लाल रंग में बहता रहा और फिर नीला पड़ गया.*

*लाल रंग की वजह वो ख़ून था जो गलियों से बह-बहकर नदी में मिलता रहा और सियाही इस वजह से कि शहर के सैंकड़ों पुस्तकालयों में महफ़ूज़ दुर्लभ नुस्खे नदी में फेंक दिए गए थे और उनकी सियाही ने घुल-घुलकर नदी के लाल रंग को हल्का कर दिया था.*

*फ़ारसी के बड़े शायर शेख़ सादी काफ़ी वक़्त बग़दाद में रहे थे और उन्होंने यहां के मदरसे निज़ामिया में तालीम हासिल की थी.*

*इसलिए उन्होंने बग़दाद के पतन पर यादगार नज़्म लिखी जिस का एक-एक शेर दिल को दहला देता है.*

*हलाकू ख़ान ने 29 जनवरी सन 1257 को बग़दाद की घेराबंदी की शुरुआत की थी.*

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*📮आगे इन शा अल्लाह अगली पोस्ट में*

*📜नोट: पोस्ट कहि कोई गलती नज़र आए तो मेरी इस्लाह करे में सुधार करूंगा इन शा अल्लाह*



              

अरतुगुल गाजी 1

*⚔️🇹🇷सल्तनत ए उस्मानिया🇹🇷⚔️*

*पोस्ट नम्बर 1️⃣*

*जब भी मुलमानों पे जुल्म या जातति होती हे तो सबसे पहले जो आवाज़ बुलंद होती हे वो तुर्की से होती हे रजब तय्यब अर्दोन की_आखिर किया बात है जो तुर्की अमेरिका को भी आंखे दिखता हे और कहता हे , हमे जंग की धमकी मत देना ,हमारा इतिहास पढलो पहले*

*उसकी वजह हे ख़िलाफ़ते उस्मानिया का इतिहास जो आपको पोस्ट बाय पोस्ट बताऊंगा इन शाह अल्लाह*

*सल्तनत ए उस्मानिया जिसे ख़िलाफ़त ए उस्मानिया भी कहते हे ईसाई इलाको में इस्लाम के झंडे गाड़ने वाली सल्तनत जिसने सलेबी (ईसाई लस्कर) को वो जख्म दिए की आज तक उससे वो उभर ना पाए , रोम की 1हजार साला हुकूमत को उखाड़ फेंकने ओर कुस्तुन्तुनिया को फतह करके ,इस्लाम की वो दास्तान लिखदी कि आज भी दुश्मन पढ़ कर थर्रा जाता हे, इस सल्तनत ने तक़रीबन 600 साल तक हुकूमत की 1453 से 1922 तक*

1922 में सल्तनत उस्मानिया को खत्म करके उसपे पाबंदी लगा के पूरे खानदान को अरब छोड़ने पे मजबूर किया , 100 साल का मुहाइदे में तरह तरह की पाबंदी लगा दी ताके तुर्की फिर कहर बनके ना टूट पड़े ईसाईयो पे , इस *मुहाइदे कि उम्र भी मुकम्मल होने वाली हे 2023 में तुर्की फिर से पाबंदियों से आज़ाद हो जाएगा* 

 *सल्तनत ए उस्मानिया को हटाना, एक बोहोत बड़ी सलेबी, ईसाई साजिश थी _बर्तानवी जासूस हम्फर (hempher) ने इसमें अहम किरदार अदा किया था_* 

*में आखिरी पोस्ट में जासूस हम्फर (hempher) पर पोस्ट बनाऊँगा ओर उसी की जबानी उसकी पूरी जासूसी की दास्तान बताउंगा, ओर उसपे कई पोस्ट बनेगी सिर्फ बर्तानिया जासूस ही नही बल्कि मुसलमान कहलाने वाले कई लोग भी शामिल थे । ये सब कैसे हुवा कोन कोन सामिल थे सलेबी जासूस ने किया लिखा वो सब आपको बताऊंगा  लेकिन सबसे आखिर में ।* 

*इसलिए कि में इब्तिदा से आगाज़ करना बेहतर समझता हूं  ताके पढ़ने वालों को समझने में आसानी हो*
 
*1258 ई में ख़िलाफ़ते अब्बासियों का तातारियों (मंगोल) के हाथों कत्ले आम के साथ खत्मा हुवा ओर आखिरी अब्बासी खलीफा मुस्त असीम बिल्लाह को जानवर की खाल में लपेट कर घोडे दौड़ा कर कुचल दिया गया ,,,,।।*

है अयां फितना ए तातार के अफसाने से..
पासबां मिल गए काबे को सनम खाने से..!!

बाद में यही तातारी कौम मुसलमान हो गई और तुर्क नस्ल के नाम से मशहूर हुई…  

*1.. तुर्काने तैमूरी… जिसकी नस्ल में बाबर पैदा हुआ और भारत में मुगल साम्राज्य की बुनियाद डाली।*

*2.. तुर्काने सफवी… जिसकी हुकूमत ईरान में क़ायम हुई*

*3.. तुर्काने सलजूकी… इस खानदान की बहुत मजबूत हुकूमत तुर्की के इलाके में…इस्ताम्बूल (कुस्तुनतुनिया ) को छोड़कर.. आसपास क़ायम हुई..!!*

वक्त के साथ साथ सलजूकी हुकूमत जब कमजोर होने लगी तो कई छोटी छोटी रियासतों में बंट गई… आसपास मौजूद छोटे सुल्तान… सलजूकी सुल्तान पर हमले करने लगे…. और सन् 1300 ई0 तक सेल्जुकों का पतन हो गया था…!!

*इन्ही रियासतों में मगरिबी अनातोलिया की छोटी सी रियासत में ,अल तुगरल, (गाज़ी eurtgul) एक तुर्क सुल्तान थे…!!*
एक बार जब वो एशिया माइनर की तरफ़ कूच कर रहे थे तो रास्ते में एक जगह पर दो छोटी फौजों को जंग करते हुए देखा… जिसमें से एक तरफ की फौज शिकस्त के करीब थी… उन्होंने अपनी चार सौ घुड़सवारों की सेना को किस्मत की कसौटी पर आजमाया.. उन्होंने हारते हुए पक्ष का साथ दिया और लडाई जीत ली… उन्होने जिनका साथ दिया वे सल्जूक थे…!!

*गाजी अल तुगरल (Eurtgul) ही वो पहले सख्स थे जिन्होंने सल्तनत ए उस्मानिया की नींव रखी और आप ही के बेटे गाज़ी उस्मान के नाम से सल्तनत का नाम उस्मानिया रखा गया*


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*📮आगे इन शा अल्लाह अगली पोस्ट में*


                 

अरतुगुल गाज़ी 3

*⚔️🇹🇷सल्तनत ए उस्मानिया🇹🇷⚔️*
 
*पोस्ट 3️⃣*

*ये पोस्ट सल्तनतें उस्मानिया पे नही हे ,सल्तनत ए अब्बासिया हलाकू खान पे हे ये उसी दौर की बात हे, इसी हलाकू खान की तबाही की वजह से गाज़ी अल तुगरल ने मुसलमान को मजबूत किया और फिर सल्तनत ए उस्मानिया की सुरुआत हुई ।*

*सल्तनत ए अब्बासिया ओर मंगोल हलाकू खान*

*पार्ट 2*

*कल की पोस्ट में हलाकू खान की दरिंदगी को मैने बताया था कि कैसे उसने मुसलमानो को क़त्ल किया*

*मोर्रिकहीन लिखते हे कि इस हलाकू खान ने सिर्फ मुसलमान को क़त्ल ही नही किया बल्कि मसाजिद को भी सहीद करवाया उस वक़्त दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेली , बिग वर्ल्ड लाइब्रेली, में जितनी भी कुतुबे हदीश थी जितनी भी किताबे क़ुरआन की तफ़्सीर वगेरा सब इसने दजला नदी में डलवा दी थी जिसकी सिहाई से दजला का पानी काला हो गया था कई दिनों तक ऐसा ही रहा*

*दजला का पानी लाल भी हुवा ओर उसकी वजह मुसलमानो का खून था जिसने 11 लाख से ज्यादा आबादी वाले सहर में ऐसा क़त्ल गारत का नंगा नाच किया कि सिर्फ लासे ही नज़र आती थी*

*हलाकू खान ने 29 जनवरी 1257 को बगदाद की घेरा बन्दी की थी*


*इससे पहले उसने खत लिखा था* 

हलाक़ू का खत

*हमले से पहले हलाक़ू ने ख़लीफ़ा को लिखा था, "लोहे के सूए को मुक्का मारने की कोशिश न करो. सूरज को बुझी हुई मोमबत्ती समझने की ग़लती न करो. बग़दाद की दीवारें फ़ौरन गिरा दो. उसकी खाइयां पाट दो, हुकूमत छोड़ दो और हमारे पास आ जाओ. अगर हमने बग़दाद पर चढ़ाई की तो तुम्हें न गहरे पाताल में पनाह मिलेगी और न ऊंचे आसमान में."*

37वें अब्बासी ख़लीफ़ा मुसतआसिम बिल्लाह की वो शानो शौकत तो नहीं थी जो उनके पूर्वजों के हिस्से मेंआई थी.

लेकिन फिर भी मुस्लिम दुनिया के अधिकतर हिस्से पर उनका सिक्का चलता था और ख़लीफ़ा की यह ताक़त थी कि उन पर हमले की ख़बर सुनकर मराकश से लेकर ईरान तक के सभी मुसलमान उनके समर्थन में खड़े हो जाते थे.

*इसलिए ख़लीफ़ा ने हलाकू को जवाब में लिखा, "नौजवान, दस दिन की ख़ुशकिस्मती से तुम ख़ुद को ब्रह्मांड का मालिक समझने लगे हो. मेरे पास पूरब से पश्चिम तक ख़ुदा को मानने वाली जनता है. सलामती से लौट जाओ."*

हलाकू ख़ान को अपने मंगोल सिपाहियों की क्षमता पर पूरा भरोसा था.

वो पिछले चार सालों के दौरान अपने देश मंगोलिया से निकलकर चार हज़ार मील दूर तक आ पहुंचे थे और इस दौरान दुनिया के बड़े हिस्से को अपना बना चुके थे.

बग़दाद पर हमले की तैयारियों के दौरान न सिर्फ़ हलाकू ख़ान के भाई मंगू ख़ान ने नए सैनिक दस्ते भिजवाए थे बल्कि अरमेनिया और जॉर्जिया से ख़ासी संख्या में इसाई फ़ौजें भी उनके साथ आ मिली थीं जो मुसलमानों से सलीबी जंगों में पूरब की हार का बदला लेने के लिए बेताब थीं.

यही नहीं मंगोल फ़ौज तकनीकी लिहाज़ से भी कहीं ज़्यादा बड़ी और आधुनिक थी. मंगोल फ़ौज में चीनी इंजीनियरों की इकाई थी जो बारूद के इस्तेमाल में महारत रखती थी.

बग़दाद के लोग उन तीरों के बारे में जानते थे जिन पर आग लगाकर फेंका जाता था लेकिन बारूद से उनका कभी वास्ता नहीं पड़ा था.

*मंगोल धर्म में किसी बादशाह का ज़मीन पर ख़ून बहाना अपशकुन समझा जाता था.*

इसलिए हलाकू शुरू में ख़लीफ़ा को यह विश्वास दिलाता रहा कि वह बग़दाद में उसका मेहमान बनकर आया है.

*ख़लीफ़ा की मौत के बारे में कई कहानियां मशहूर हैं. हालांकि, अधिक भरोसेमंद हलाकू के मंत्री नसीरूद्दीन तोसी का बयान है जो उस मौके पर मौजूद थे.*

वो लिखते हैं कि ख़लीफ़ा को चंद दिन भूखा रखने के बाद उनके सामने एक ढका हुआ बर्तन लाया गया.

*भूखे ख़लीफ़ा ने बेताबी से ढक्कन उठाया तो देखा कि बर्तन हीरे-जवाहरात से भरा हुआ है. हलाकू ने कहा, 'खाओ.' मुसतआसिम बिल्लाह ने कहा, "हीरे कैसे खाऊं?"*

*हलाकू ने जवाब दिया, "अगर तुम इन हीरों से अपने सिपाहियों के लिए तलवारें और तीर बना लेते तो मैं नदी पार न कर पाता."*

अब्बासी ख़लीफ़ा ने जवाब दिया, "ख़ुदा की यही मर्ज़ी थी." हलाकू ने कहा, "अच्छा तो अब मैं जो तुम्हारे साथ करने जा रहा हूं वो भी ख़ुदा की मर्ज़ी है."

*उसने ख़लीफ़ा को नमदों में लपेटकर उसके ऊपर घोड़े दौड़ा दिए ताकि ज़मीन पर ख़ून न बहे.*

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*📮आगे इन शा अल्लाह अगली पोस्ट में*


                  

Monday, 13 January 2020

कॉम के हीरो

*बासनी की  एक  अजीमुशान
शख्सियत क्या आप  इनको जानते हो  ।।
आप मरहूम हाजी मोहम्मद इब्राहिम अब्दुल लतीफ मंडल (मस्तान डेयरी वाले मौजुदा सरपंच हाजी मोहम्मद सरदार भाई के वालिद साहब)


*नागौरी सोसायटी मुम्बईः-* 
आपके दिल में कौम का दर्द था आपने बम्बई में फेरी वालो (सरस वालों) और दुकानदारो के साथ हो रही नाइंसाफी से जिद्दोजहद शुरु की। पुराने वक्त में सरस वाले घर घर और होटलों में दूध पहुंचाते थ,े दूध का बिल गवलियों की तरफ से बधां और छुट्ठा (बाजार भाव) से बनता था। आपने बाजार में दलालो से और भैंसो वालो से मांग की के बाजार भाव तय करने में दुकानदारो को भी शामिल किया जाए। उन्होने आपकी बात नहीं मानी आपने कोर्ट में उनके खिलाफ केस कर दिया आपका साथ मरहूम हाजी अब्दुल गप्फार (कमाल डेयरी) मरहूम हाजी हासम (हाजी डेयरी), हाजी फारुख (सेन्ट्रल डेयरी), मरहूम हाजी सद्धीक (चॉकलेट), मरहूम हाजी जहूरदीन कालू वाले, मरहूम हाजी अमीर अहमद चांद वाले, मरहूम अब्दुल रशीद चौहान (कैप्टन), मरहूम हाजी अनवर हसन छावनी वाले, मरहूम हाजी अब्दुल गप्फार कुम्हारी (राजस्थान डेयरी) और गांव के सभी दुकानदारो ने दिया। काफी जद्दोजहद के बावजूद आप केस हार गए, आपने अपनी लड़ाई को आगे बढाते हुए बम्बई में दूध की हड़ताल करवा दी जिसमें अपने लोगो के साथ साथ नरीमन फारसी (फारसी डेयरी) चन्दू हलवाई, भाई शंकर गौरी शंकर, व्यास जी पाउडर वाला, और अब्दुल करीम दलाल ने भी दिया। हड़ताल की वजह से चिल्लियां ने मस्तान डेयरी का दूध भी उसी दिन बंद कर दिया। गांव के दुकानदारो ने थोड़ा थोड़ा दूध देकर मस्तान डेयरी को चालू रखा। 
इस हड़ताल में गांव के चन्द लोगो के साथ मौजूदा सरपंच भाई सरदार को अपने बचपन में ही गिरप्तार कर लिए गए और दस दिन तक कुर्ला वार्ड चौकी में बन्द रहे। हड़ताल के बाद भी कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद आपने झूला मैदान मदनपूरा में नागौरियों की आम मिटिंग रखी और नागौरी सोसायटी बनाने का फैसला किया। जिसमें आप के दोस्त शान्तिलाल सेठ आपको जलगांव लेकर गए। शांतीलाल सेठ ने अपनी जिनिंग फैक्टरी (कपास फैक्टरी) जलगांव स्टेशन के पास दूध रखने की जगह दी। और गांव गांव फिरकर दूध जमा करने का काम शुरु किया। बोरिवली में हाजी फखरु हल्लू वाले की दुकान पर दूध रखा गया। इस तरह आपने नागौरी सोसायटी की बुनियाद रखी गई और आप उसके सदर बने।  
आप कौम के लिए ऐसा दरख्त लगाकर गए जो पूरे साल दिन में दोनो वक्त आज भी फल दे रहा है। आपने कौम की बुनियाद को मजबूत किया।

महाराष्ट्र सरकार ने आपकी खिदमात को देखते हुए दो बार आपको स्पेशल एक्जिक्टिव मजिस्ट्रेट(special executive megistrate) बनाकर आपका सम्मान किया।


 *मदरसा मदीना तुल उलूम :-* 
फुलपुरा के छोटे बच्चे बाजार में मदरसा इस्लामिया रहमानिया में पढने जाते थे चुंकि मदरसे तक पहुंचने में काफी वक्त लग जाता था। आपने फुलपुरा के मोअज्जीज हजरात से मिलकर अपने बाड़े में पट्ठिया लगाकर मदरसे की बुनियाद रखवाई, बाद में मरहूम हाजी उस्मान (कुरेशी डेयरी ) वालो ने चार घरों की जमीन मदरसे के लिए दी। और कुछ जमीन रोशन चिराग कुआं से हासिल की गई। और मदरसा वजूद में आया। आज सैंकड़ो बच्चे इस से फेजिआब हो रहे है। मदरसा बनवाने की वजह से फुलपुरा वालो को बांग्लादेशी कहा गया।

 *नागौरी कौमी जमातः-* 
आप जमाअत बनाने में भी पेश पेश रहे, पहली जमाअत के नायब सदर बने और उसके बाद में सदर बने। जमाअत बनाने में हाजी अब्दुल रशीद बांगी, मरहूम हाजी मोहम्मद उस्मान एम एल ए साहब, हाजी अब्दुल गप्फार (आजम डेरी) के साथ मिलकर कौमी जमाअत बनाई।
हाजी अब्दुल गफ्फार अज़म साहब जमात के पहले सदर बनेl और आप नायब सदर बने

Friday, 13 January 2017

वाजिबाते नमाज़

*वाजिबाते नमाज़*
( *किस्त नo.*1⃣)
1.तकबीरे तेहरीमा में अल्लाहु'अकबर कहना।
2.फर्ज़ की तीसरी और चौथी रकात के अलावा बाकी तमाम नमाज़ों की हर रकात में अल'हम्द शरीफ पढ़ना, सूरत मिलाना या क़ुरआने मजीद की एक बड़ी आयत (जो छोटी तीन आयतों के बराबर हो)या तीन छोटी आयात पढ़ना।
3.अल'हम्द शरीफ का सूरत से पहले पढ़ना।
4.अल'हम्द और सूरत के दरमियान आमीन और बिस्मिल्लाह के अलावा कुछ ना पढ़ना।
5.किरा'अत के बाद फ़ौरन रुकू करना।
6.एक सजदे के बाद बित्तरतीब(तरतीब से) दूसरा सजदा करना।
7.तादीले अरकान यानी हर रुक्न को ठहर ठहर कर अदा करना(रुकू, सुजूद, कौमा और जलसा में कम अज़ कम एक बार सुबहान'अल्लाह कहने की मिक़दार ठहरना।
8.जलसा यानी दोनों सजदों के दरमियान सीधा बेठना कुछ लोग जल्दी जल्दी में सीधा बेठने से पहले ही दूसरा सजदा कर लेते हैं ऐसा करने से नमाज़ मकरूह तहरीमी होगी(इसको लौटाना वाजिब होगा)।
9.क़ादा ए ऊला वाजिब है अगरछे नमाज़ नफिल हो।
10.फर्ज़ वित्र और सुन्नते मो'अक्किदा के कादा ए ऊला में तशह्हुद(अत्तहिय्यात)के बाद कुछ ना पढ़ना।
11.दोनों का'अदों में तशह्हुद मुकम्मल पढ़ें।एक लफ्ज़ भी छूट जाये तो नमाज़ मकरूह तहरीमी होगी।
12.फर्ज़ वित्र और सुन्नते मो'अक्किदा के कादा ए ऊला में तशह्हुद के बाद अगर भूल कर "अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद" या "अल्लाहुम्मा सल्ले अला सय्यदिना" कह दिया तो सज्दा ए सहव वाजिब होगा-और जान बूझ कर कहा तो नमाज़ लौटाना वाजिब है
13.दोनों तरफ सलाम फेरते वक़्त लफ्ज़ अस्सलाम कहना वाजिब है(अलैकुम वाजिब नहीं बल्की सुन्नत है)।
14.वित्र में तकबीरे कुनूत कहना।
15.वित्र में दुआ ए कुनूत पढ़ना
16.ईदैन में 6 तकबीरें।
17.ईदैन में दूसरी रकात की तकबीरे रुकू और उस तकबीर के लिए लफ्ज़े "अल्लाहु अकबर" कहना।
18.जहरी नमाज़ जैसे मगरिब,इशा की पहली और दूसरी रकात में और फज़र, जुमा,ईदैन, तरावीह और रमजान शरीफ के वित्र की हर रकात में इमाम को जहर यानि(इतनी आवाज़ से किरात करना के 3 आदमी सुन सकें पढ़ना) वाजिब है।
19.गैर जहरी नमाज़ यानी ज़ोहर और असर में आहिस्ता आवाज़ में किरात करना।
20.हर फर्ज़ व वाजिब का उसकी जगह पर होना।
21.रुकू हर रकात में 1 ही बार करना।
22.सजदे हर रकात में 2 बार ही करना।
23.दूसरी रकात से पहले कादा ना करना।
24. चार रकात वाली नमाज़ में तीसरी रकात पर कादा ना करना।
25. आयते सज्दा पढ़ी हो तो सज्दा ए तिलावत करना।
26.सज्दा ए सहव वाजिब हो तो सज्दा ए सहव करना।
27.इमाम जब किरा'अत करे (चाहे आहिस्ता आवाज़ में करे या बुलन्द आवाज़ में करे)तो मुक़तदी को चुप रहना वाजिब है।
28.किरा'अत के अलावा बाकी तमाम नमाज़ों में इमाम साहब की पेरवी करना।