Monday, 11 May 2020

अरतुगुल गाज़ी 3

*⚔️🇹🇷सल्तनत ए उस्मानिया🇹🇷⚔️*
 
*पोस्ट 3️⃣*

*ये पोस्ट सल्तनतें उस्मानिया पे नही हे ,सल्तनत ए अब्बासिया हलाकू खान पे हे ये उसी दौर की बात हे, इसी हलाकू खान की तबाही की वजह से गाज़ी अल तुगरल ने मुसलमान को मजबूत किया और फिर सल्तनत ए उस्मानिया की सुरुआत हुई ।*

*सल्तनत ए अब्बासिया ओर मंगोल हलाकू खान*

*पार्ट 2*

*कल की पोस्ट में हलाकू खान की दरिंदगी को मैने बताया था कि कैसे उसने मुसलमानो को क़त्ल किया*

*मोर्रिकहीन लिखते हे कि इस हलाकू खान ने सिर्फ मुसलमान को क़त्ल ही नही किया बल्कि मसाजिद को भी सहीद करवाया उस वक़्त दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेली , बिग वर्ल्ड लाइब्रेली, में जितनी भी कुतुबे हदीश थी जितनी भी किताबे क़ुरआन की तफ़्सीर वगेरा सब इसने दजला नदी में डलवा दी थी जिसकी सिहाई से दजला का पानी काला हो गया था कई दिनों तक ऐसा ही रहा*

*दजला का पानी लाल भी हुवा ओर उसकी वजह मुसलमानो का खून था जिसने 11 लाख से ज्यादा आबादी वाले सहर में ऐसा क़त्ल गारत का नंगा नाच किया कि सिर्फ लासे ही नज़र आती थी*

*हलाकू खान ने 29 जनवरी 1257 को बगदाद की घेरा बन्दी की थी*


*इससे पहले उसने खत लिखा था* 

हलाक़ू का खत

*हमले से पहले हलाक़ू ने ख़लीफ़ा को लिखा था, "लोहे के सूए को मुक्का मारने की कोशिश न करो. सूरज को बुझी हुई मोमबत्ती समझने की ग़लती न करो. बग़दाद की दीवारें फ़ौरन गिरा दो. उसकी खाइयां पाट दो, हुकूमत छोड़ दो और हमारे पास आ जाओ. अगर हमने बग़दाद पर चढ़ाई की तो तुम्हें न गहरे पाताल में पनाह मिलेगी और न ऊंचे आसमान में."*

37वें अब्बासी ख़लीफ़ा मुसतआसिम बिल्लाह की वो शानो शौकत तो नहीं थी जो उनके पूर्वजों के हिस्से मेंआई थी.

लेकिन फिर भी मुस्लिम दुनिया के अधिकतर हिस्से पर उनका सिक्का चलता था और ख़लीफ़ा की यह ताक़त थी कि उन पर हमले की ख़बर सुनकर मराकश से लेकर ईरान तक के सभी मुसलमान उनके समर्थन में खड़े हो जाते थे.

*इसलिए ख़लीफ़ा ने हलाकू को जवाब में लिखा, "नौजवान, दस दिन की ख़ुशकिस्मती से तुम ख़ुद को ब्रह्मांड का मालिक समझने लगे हो. मेरे पास पूरब से पश्चिम तक ख़ुदा को मानने वाली जनता है. सलामती से लौट जाओ."*

हलाकू ख़ान को अपने मंगोल सिपाहियों की क्षमता पर पूरा भरोसा था.

वो पिछले चार सालों के दौरान अपने देश मंगोलिया से निकलकर चार हज़ार मील दूर तक आ पहुंचे थे और इस दौरान दुनिया के बड़े हिस्से को अपना बना चुके थे.

बग़दाद पर हमले की तैयारियों के दौरान न सिर्फ़ हलाकू ख़ान के भाई मंगू ख़ान ने नए सैनिक दस्ते भिजवाए थे बल्कि अरमेनिया और जॉर्जिया से ख़ासी संख्या में इसाई फ़ौजें भी उनके साथ आ मिली थीं जो मुसलमानों से सलीबी जंगों में पूरब की हार का बदला लेने के लिए बेताब थीं.

यही नहीं मंगोल फ़ौज तकनीकी लिहाज़ से भी कहीं ज़्यादा बड़ी और आधुनिक थी. मंगोल फ़ौज में चीनी इंजीनियरों की इकाई थी जो बारूद के इस्तेमाल में महारत रखती थी.

बग़दाद के लोग उन तीरों के बारे में जानते थे जिन पर आग लगाकर फेंका जाता था लेकिन बारूद से उनका कभी वास्ता नहीं पड़ा था.

*मंगोल धर्म में किसी बादशाह का ज़मीन पर ख़ून बहाना अपशकुन समझा जाता था.*

इसलिए हलाकू शुरू में ख़लीफ़ा को यह विश्वास दिलाता रहा कि वह बग़दाद में उसका मेहमान बनकर आया है.

*ख़लीफ़ा की मौत के बारे में कई कहानियां मशहूर हैं. हालांकि, अधिक भरोसेमंद हलाकू के मंत्री नसीरूद्दीन तोसी का बयान है जो उस मौके पर मौजूद थे.*

वो लिखते हैं कि ख़लीफ़ा को चंद दिन भूखा रखने के बाद उनके सामने एक ढका हुआ बर्तन लाया गया.

*भूखे ख़लीफ़ा ने बेताबी से ढक्कन उठाया तो देखा कि बर्तन हीरे-जवाहरात से भरा हुआ है. हलाकू ने कहा, 'खाओ.' मुसतआसिम बिल्लाह ने कहा, "हीरे कैसे खाऊं?"*

*हलाकू ने जवाब दिया, "अगर तुम इन हीरों से अपने सिपाहियों के लिए तलवारें और तीर बना लेते तो मैं नदी पार न कर पाता."*

अब्बासी ख़लीफ़ा ने जवाब दिया, "ख़ुदा की यही मर्ज़ी थी." हलाकू ने कहा, "अच्छा तो अब मैं जो तुम्हारे साथ करने जा रहा हूं वो भी ख़ुदा की मर्ज़ी है."

*उसने ख़लीफ़ा को नमदों में लपेटकर उसके ऊपर घोड़े दौड़ा दिए ताकि ज़मीन पर ख़ून न बहे.*

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*📮आगे इन शा अल्लाह अगली पोस्ट में*


                  

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